Banaras Ki Bhor

शीर्षक: काशी की भोर सूरज की पहली लाली जब गंगा-घाट को छूती है, मानो अज्ञान के तिमिर से, नई चेतना जगती है। जैसे नभ में सूर्य का, धीरे-धीरे उत्थान है, अंधियारे से लड़ने का नाम ही, असल जीवन-ज्ञान है। अविरल बहती माँ गंगा, एक गहरा पाठ पढ़ाती है, “रुकना नहीं, बस चलते रहना,” मौन भाव से गाती है। क्या सुख-दुःख, क्या पाप-पुण्य, सब खुद में लीन कर लेती है, जो त्याग सके सब बोझ यहीं, उसे ही ‘मोक्ष’ ये देती है। ...

November 28, 2025 · 1 min · Sanjay Upadhyay