शीर्षक: काशी की भोर

सूरज की पहली लाली जब गंगा-घाट को छूती है,
मानो अज्ञान के तिमिर से, नई चेतना जगती है।
जैसे नभ में सूर्य का, धीरे-धीरे उत्थान है,
अंधियारे से लड़ने का नाम ही, असल जीवन-ज्ञान है।

अविरल बहती माँ गंगा, एक गहरा पाठ पढ़ाती है,
“रुकना नहीं, बस चलते रहना,” मौन भाव से गाती है।
क्या सुख-दुःख, क्या पाप-पुण्य, सब खुद में लीन कर लेती है,
जो त्याग सके सब बोझ यहीं, उसे ही ‘मोक्ष’ ये देती है।

सुदूर देश से आए पंछी, नभ में शोर मचाते हैं,
“हम मेहमान हैं इस धरती के,” यह सच दिखलाते हैं।
जैसे ये उड़ जाएंगे कल, अपनी राहों की ओर,
तेरा-मेरा सब छूट जाएगा, जिस दिन आएगी असली भोर।

कहीं भस्म रमाये साधु बैठे, नश्वर देह को जाने हैं,
कहीं लगा रहे डुबकी भक्त, जो ईश्वर को पहचाने हैं।
एक ही जल में राजा-रंक, सब एक साथ ही नहाते हैं,
अहंकार की मैल धोकर, सब शून्य भाव हो जाते हैं।

बनारस की ये सुबह, मात्र नज़ारा नहीं, एक दर्पण है,
प्रकृति और परमात्मा के चरणों में, यह जीवन का समर्पण है।